Sunday, 6 September 2015

ग़ज़ल # 25

याद हरदम आशिक़ी के वो ज़माने ही रहे।

हिज़्र का आलम मगर मौसम सुहाने ही रहे।


इश्क़ ने ग़ाफ़िल किया यूँ, भूल बैठे थे जहां,

अक़्स आँखों में, लबों पर फिर तराने ही रहे।


नफरतों के साथ जीते हैं, कई तो उम्र भर,

आशिक़ों के तो बिखरते, आशियाने ही रहे।


याद रहती है किसे, गर हो मुकम्मल दास्तां,

याद तो अक्सर अधूरे से फ़साने ही रहे।


ख़त लिखे भी और भेजे भी नहीं उनको 'किरण'

क्या करें गैरों में उनके, जब ठिकाने ही रहे।

©विनीता सुराना 'किरण'