Sunday, 20 July 2014

ग़ज़ल # 4

चली है फिर हवाएं ये कहाँ मन को उड़ाती हैं  
बरसती है ये बूंदें या तराने गुनगुनाती हैं

है वाकिफ दर्द से मेरे सभी ये पत्तियाँ भी अब
भिगोया बारिशों ने है, कि अश्कों में नहाती हैं

विसाले यार की तो आरज़ू होती बहुत लेकिन
क़मर जब भी दिखाई दे, फिज़ाएं क्यूँ लजाती हैं   

कभी हो फ़ासले भी गर मुहब्बत कम नहीं होती
नहीं हो राबता फिर भी वो यादें दिल जलाती हैं

सुना है अब ज़माने में वफ़ा मिलती किताबों में
किरणजब ज़िक्र हो उनका, वफ़ाएं याद आती हैं
©विनिता सुराना 'किरण' 

ग़ज़ल # 3

साहिल पर कब तक भटकेंगे
मिलने को यूँ ही तरसेंगे

शबनम के कतरे आँखों में
क्या फिर ये बादल बरसेंगे

चिंगारी दिल में सुलगी है
मत छेड़ो शोले भड़केंगे

मिलने आई यादें जिस दिन
सहरा में भी गुल महकेंगे

भरने दो परवाज़ 'किरण' अब 
पंछी भी खुल कर चहकेंगे
©विनिता सुराना 'किरण' 

तिश्नगी (गीत)

ये कैसी तिश्नगी है
जो बुझती ही नहीं है
ये किसकी जुस्तजू है
जो रुकती ही नहीं है

सावन के धारें हैं पलकों के भीतर 
क्यूँ प्यासी ये अँखियाँ जैसे हो बंजर
साँसें ये सुलगी सी रहती हैं हर दम
चलती है धड़कन ये बस यूँ ही थम-थम
ये कैसी बेकसी है, जो मिटती ही नहीं है
ये कैसी तिश्नगी ....

मिलने का मौसम ये रुत है दीवानी
बिखरे से ख़्वाबों ने हठ है ये ठानी
तय हो भी जाए ये मीलों की दूरी
मिल जाये मन तो ये ख्वाहिश हो पूरी
ये कैसी आरज़ू है, जो मिलती ही नहीं है

ये कैसी तिश्नगी ....
©विनिता सुराना 'किरण'