ये कैसी तिश्नगी है
जो बुझती ही नहीं है
ये किसकी जुस्तजू है
जो रुकती ही नहीं है
सावन के धारें हैं पलकों के भीतर
क्यूँ प्यासी ये अँखियाँ जैसे हो बंजर
साँसें ये सुलगी सी रहती हैं हर दम
चलती है धड़कन ये बस यूँ ही थम-थम
ये कैसी बेकसी है, जो मिटती ही नहीं है
ये कैसी तिश्नगी ....
मिलने का मौसम ये रुत है दीवानी
बिखरे से ख़्वाबों ने हठ है ये ठानी
तय हो भी जाए ये मीलों की दूरी
मिल जाये मन तो ये ख्वाहिश हो पूरी
ये कैसी आरज़ू है, जो मिलती ही नहीं है
ये कैसी तिश्नगी ....
©विनिता सुराना 'किरण'

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