Wednesday, 26 May 2021

ग़ज़ल#67

बिखरते है संवरते है दिलों में फिर भी पलते हैं ।
ये ख़्वाबों के परिंदे है उड़ाने रोज़ भरते हैं।

संभाले है मरासिम ये बहुत अरमान से लेकिन
दुखाते हैं बहुत दिल को कभी जब वार करते हैं ।

कभी वादे किये तुमने भुला बैठे हो पल भर में
भरम ये जो वफ़ा का है न टूटे अब यूँ डरते हैं ।

धड़कने से अगर दिल के यकीं हो जाए जीने का 
सम्भालो दिल तुम्हें दे के चलो हम आज मरते हैं ।

ख़ुशी के चार पल काफ़ी गमों के जब अँधेरे हो
‘किरण’ इक आस की चमके हज़ारों दीप जलते हैं ।

©विनीता किरण

Tuesday, 28 July 2020

तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे !

        कभी नहीं समझ पायी कि बचपन से ही मुझे संगीत से लगाव क्यों है ... बस जैसे मेरी दिनचर्या में शामिल है संगीत ...तभी तो कुदरत की हर शय में सुनाई देता है संगीत ! 
जब भी कोई खूबसूरत गीत सुना रेडियो पर तो लगा या तो मैं गा रही हूं किसी के लिए या कोई मेरे लिए गा रहा है। कोई रूमानी गीत बजता तो सारा समां रुमानियत से सराबोर हो जाता, कोई विरह गीत बजता तो ख़ुद-ब-ख़ुद आंखें नम हो जातीं, कोई नृत्य गीत बजता तो कदम ख़ुद ही थिरकने लगते । अब जब सोचती हूँ तो लगता है कुछ भी बेवज़ह नहीं था, बस एक ज़रिया था 'तुम' को महसूस करने का अपने आस-पास। जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता गया, ये अहसास और भी मुखर होता गया कि कोई कहीं है जो मुझसे जुड़ा है, जो मेरे लिए है, मेरे जैसा है और मुझे पूरा करता है ।
            अपने ही ख्यालों में डूबी मैं जब कभी वो गीत गुनगुनाती तो अक्सर मन वहाँ ले जाता, जहाँ कुदरत की गोद में लेटे मैं 'तुम्हारी' आंखों में कितने ही प्रेम पत्र पढ़ लेती और उनके जवाब भी लिख देती अपनी उंगलियों से ... हर स्पर्श एक अलग हर्फ़ उकेरता और तुम उतनी ही आसानी से पढ़ भी लेते, उसमें छुपे कितने ही एहसास ... आख़िर ये हमारी ही तो गढ़ी हुई भाषा थी, महज़ एक हल्का सा स्पर्श भी इतना कुछ कह जाता जिसकी व्याख्या शायद कोई 200 पृष्ठ की पुस्तक भी न कर सके ।             
         आज से पहले कभी कहाँ समझ पायी कि उस गीत के इतने मायने क्यों थे मेरे लिए, कि कहीं सबसे भीतर का कोना तक भीग जाता उसकी फुहार में, मौसम कैसा भी हो पर रिमझिम का सा एहसास देर तक, दूर तक भीगो जाता। आकाश की चादर में टंके सारे सितारे मेरे साथी बन चुके थे जिनसे घंटो बतियाते कितनी ही रातें सहेजती गयी अपनी डायरी के कोरे कागज़ों में ताकि अगर किसी दिन किसी मोड़ पर अचानक मिल जाओ 'तुम' तो तोहफे में दे सकूँ अपने सारे अल्फ़ाज़ और 'तुम' जीयो मेरे साथ वो सारे अहसास ..
     आज अरसे बाद जब 'तुम' अपने पसंदीदा गीत गुनगुना रहे थे मैं सोच-सोच बस मुस्कुराती रही कि मेरी पसंद का हर गीत तुम्हारी पसंद में भी तो शामिल है । फिर अचानक तुम्हारी ज़ुबाँ से वही गीत निकला और वो मेरी स्मृतियों की कैद से रिहा हो गया, साथ ही रिहा हो गए कुछ रंग, कुछ लकीरें, कुछ हसरतें और वो भीनी सी ख़ुशबू जो अक्सर शाम से ही मुझे अपने आगोश में समेट लिया करती थी और फिर रात की चादर में लिपटे ख़्वाब भी महक उठते थे। हर सुबह वो अजीब सी कशिश मुझे बेचैन कर देती और मैं बेसब्री से फिर इंतज़ार करती एक और शाम का ....
          कभी अनजाने-अनदेखे हमसफ़र के साथ गाए उस गीत को आख़िर उसके सही मुक़ाम तक पहुँचा ही दिया 'तुमने'.. देखो हवा गुनगुना रही है वही गीत आज और मैं तुम्हारे आग़ोश में बैठी बस तुम्हारी धड़कनों का संगीत सुन रही हूं, तुम्हारे स्पर्श में मुखर हो रहे है वो सारे जज़्बात जो कभी सिमट गए थे मेरी डायरी में ख़ुशबू बनकर पर सुनो तुम्हारी ख़ुशबू तब भी वाबस्ता थी मेरे शब्दों में तभी तो मीलों दूर से तुम्हारी ख़ुशबू से तुम्हें पहचान गयी मैं ... गीत के शब्दों को मायने मिल गए आज !

🎵🎶🎵🎶

वो बहारें वो चांदनी रातें
हमने की थी वो प्यार की बातें
उन नज़ारों की याद आएगी
जब ख्यालों में मुझको लाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे

🎶🎵🎶🎵

#सुन_रहे_हो_न_तुम

Monday, 27 July 2020

ग़ज़ल # 73

मुसाफिर है सभी जग में, ज़रा दो पल ठहर जाओ।
मिली फुर्सत न बरसो से, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

कभी साज़िश थी किस्मत की, कभी सूरत न मिलने की,
मुहब्बत की गुजारिश ये, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

कली चटकी, उडी तितली, सजाए रंग कुदरत ने,
खिलाए फूल भवरों ने, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

तुम्हें पाने की ख़्वाहिश में, भटकते हैं ज़माने से,
मिला है साथ, कब छूटे, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

मिली मोहलत है थोड़ी सी, बने सूरत तो मिलने की, 
'किरण' ये साँस भी रूठे, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

💖किरण

ग़ज़ल # 72

जो समझे तो इतना इशारा बहुत है।
तेरा नाम लिख कर मिटाया बहुत है।

मुहब्बत का उसकी सहारा बहुत है ।
सितमगर है लेकिन वो प्यारा बहुत है।

ये माना है इज़हार दस्तूर-ए-उल्फ़त,
मगर सुन कि दिल ने पुकारा बहुत है।

ज़ुबाँ पर थे ताले हया के मगर हाँ,
नज़र यूँ बचा के निहारा बहुत है।

हया से झुकी पलकें आहिस्ता उठना,
चुराने को दिल वो नज़ारा बहुत है।

बयां की न लफ़्ज़ों में, चाहत तो दिल की,
असर दिल पे वो छोड़ जाता बहुत है ।

मनाना तो आता नहीं हैं उसे पर,
अदाओं से अपनी हँसाता बहुत है।

है शामिल वो ख़्वाबों-ख़यालों में फिर भी,
बिना उसके इक पल भी तन्हा बहुत है।

लहक सी वो लाया 'किरण' ज़िन्दगी में,
मगर दूरियों ने सताया बहुत है।

💖 किरण

ग़ज़ल #71

शाम है कितनी हसीं, लौट के घर जाऊँ मैं ?
कौन सा घर है मेरा और किधर जाऊँ मैं?

दो घड़ी ही तो गुज़ारी है तेरे पहलू में,
और कहते हो कि बस यूँ ही गुज़र जाऊँ मैं?

हाँ मुहब्बत है तुम्हीं से, ये कहा था मैंने,
अब ज़माने से डरूँ और मुकर जाऊं मैं ?

कब के बिछड़े जो मिले हो तो नहीं जाना अब,
वक़्त भी बिगड़े तो पूछे कि सुधर जाऊं मैं?

रोशनी है तो अंधेरे भी सफ़र में होंगे,
छोड़ के हाथ 'किरण' राह में, डर जाऊं मैं?

💖 किरण

Friday, 24 August 2018

ग़ज़ल # 70


ख़ुद को ढूंढा तुम्हारी आँखों में।
क्या न खोया तुम्हारी आँखों में।

ख़्वाब सारे ही लौट आये हैं,
किसका पहरा तुम्हारी आँखों में।

चश्मे तर, सांसों में नमी सी है,
कुछ तो पिघला तुम्हारी आँखों में।

गर किताबों सा पढ़ लिया है तो,
राज़ रखना तुम्हारी आँखों में।

इक 'किरण' के सिवा सभी देखे,
लगता मेला तुम्हारी आँखों में।

©विनीता किरण

Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 69


किसी सहर का उसे इंतज़ार है अब भी
बहार आएगी फिर ऐतबार है अब भी।

फ़ना हुआ जो मुहब्बत के नाम पर हँस के,
कहीं महकती सी उसकी मज़ार है अब भी।

जिसे नसीब नहीं रौशनी का इक कतरा
दिए मगर वो बनाता हज़ार है अब भी।

हुनर से जिसके खड़ी हैं इमारतें पुरज़र (धन संपन्न)
तलाश छत की करे कामगार है अब भी।

मिला नहीं था 'किरण' दो क़दम का साथ जिसे,
वफ़ा के नाम पे वो कर्ज़दार है अब भी।

©विनीता सुराना 'किरण'