Monday, 27 July 2020

ग़ज़ल #71

शाम है कितनी हसीं, लौट के घर जाऊँ मैं ?
कौन सा घर है मेरा और किधर जाऊँ मैं?

दो घड़ी ही तो गुज़ारी है तेरे पहलू में,
और कहते हो कि बस यूँ ही गुज़र जाऊँ मैं?

हाँ मुहब्बत है तुम्हीं से, ये कहा था मैंने,
अब ज़माने से डरूँ और मुकर जाऊं मैं ?

कब के बिछड़े जो मिले हो तो नहीं जाना अब,
वक़्त भी बिगड़े तो पूछे कि सुधर जाऊं मैं?

रोशनी है तो अंधेरे भी सफ़र में होंगे,
छोड़ के हाथ 'किरण' राह में, डर जाऊं मैं?

💖 किरण

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