Monday, 27 July 2020

ग़ज़ल # 72

जो समझे तो इतना इशारा बहुत है।
तेरा नाम लिख कर मिटाया बहुत है।

मुहब्बत का उसकी सहारा बहुत है ।
सितमगर है लेकिन वो प्यारा बहुत है।

ये माना है इज़हार दस्तूर-ए-उल्फ़त,
मगर सुन कि दिल ने पुकारा बहुत है।

ज़ुबाँ पर थे ताले हया के मगर हाँ,
नज़र यूँ बचा के निहारा बहुत है।

हया से झुकी पलकें आहिस्ता उठना,
चुराने को दिल वो नज़ारा बहुत है।

बयां की न लफ़्ज़ों में, चाहत तो दिल की,
असर दिल पे वो छोड़ जाता बहुत है ।

मनाना तो आता नहीं हैं उसे पर,
अदाओं से अपनी हँसाता बहुत है।

है शामिल वो ख़्वाबों-ख़यालों में फिर भी,
बिना उसके इक पल भी तन्हा बहुत है।

लहक सी वो लाया 'किरण' ज़िन्दगी में,
मगर दूरियों ने सताया बहुत है।

💖 किरण

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