Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 69


किसी सहर का उसे इंतज़ार है अब भी
बहार आएगी फिर ऐतबार है अब भी।

फ़ना हुआ जो मुहब्बत के नाम पर हँस के,
कहीं महकती सी उसकी मज़ार है अब भी।

जिसे नसीब नहीं रौशनी का इक कतरा
दिए मगर वो बनाता हज़ार है अब भी।

हुनर से जिसके खड़ी हैं इमारतें पुरज़र (धन संपन्न)
तलाश छत की करे कामगार है अब भी।

मिला नहीं था 'किरण' दो क़दम का साथ जिसे,
वफ़ा के नाम पे वो कर्ज़दार है अब भी।

©विनीता सुराना 'किरण'

ग़ज़ल # 68

गुमसुम गुमसुम रात ढली है तन्हा सी
दुल्हन बिन श्रृंगार लगी है तन्हा सी

होम हुई है यादें तेरी सब लेकिन
पलकों में इक याद जली है तन्हा सी

अपना मिलना पल दो पल का ख्वाब रहा
मन में फिर भी आस पली है तन्हा सी

कसमें रस्में बेजां सी सब लगती है
परछाई भी आज खड़ी है तन्हा सी

बाँट सके खुशियाँ अपनो औ' गैरों में
सोच 'किरण' लेकर चली है तन्हा सी

©विनिता सुराना 'किरण'

ग़ज़ल # 66

दिल में सारे अफ़साने रख।

ग़ैरों से पर अनजाने रख।


नींद सुकूँ सब हासिल होंगे,

कुछ ख़्वाब हसीं सिरहाने रख।


अंगारों की खेती करता,

हाथों में तो दस्ताने रख।


जीना गर आसान नहीं है,

दीवानों से याराने रख।


हाल 'किरण' पूछेंगे सारे,

तू दोस्त मगर पहचाने रख।

©विनीता किरण

ग़ज़ल # 65

संदल सा महके मन मेरा
किसकी यादों का है डेरा ।

रात नहीं अब तन्हा लगती
ख्वाब किया करते हैं फेरा।

जो कुछ है 'उसकी' रहमत है
क्यूँ करता है मेरा तेरा ।

पंछी इक दिन उड़ जाना है
दुनिया ठहरी रैन बसेरा ।

रात 'किरण' लंबी हो कितनी
दूर नहीं है मगर सवेरा ।

©विनीता किरण

ग़ज़ल # 64

करें शिकवा शिकायत क्या किसे अपना कहें साथी।
शज़र ही तोड़ दे शाखें, गिला किससे करें साथी।

कभी हम बज़्म-ए-रौनक थे, निगाहों में हमीं थे तब,
वो जा बैठे हैं गैरों में, कहो कैसे सहें साथी।

ये माना उनसे उल्फ़त है, मगर गैरत भी है हम में,
बड़ा महंगा है सौदा ये, कहाँ तक हम गिरें साथी।

तुम्हें ख़त लिखने बैठे तो सियाही नम थी अश्क़ों से,
स्याही से मिलावट की, खतों में क्या लिखें साथी।

'किरण' मिलना बिछड़ना खेल होता है नसीबों का,
करम गर हो ख़ुदा का तो बदल तक़दीर दें साथी।

©विनीता सुराणा 'किरण'

ग़ज़ल # 63

अब गुज़रती है ज़िन्दगी यूँ ही।
वक़्त ने की हो दिल्लगी यूँ ही।

इस क़दर है चलन दिखावे का,
छलती देखी है सादगी यूँ ही।

जो मिला छोड़ के यहीं जाना,
पल में होगी सुपुर्दगी यूँ ही।

ख़्वाहिशों की हैं लंबी फहरिश्तें,
अब कहाँ होती बंदगी यूँ ही।

आज़माइश 'किरण' तुम्हारी है,
हर सु बिखरी है तीरगी यूँ ही।

©विनीता किरण