Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 63

अब गुज़रती है ज़िन्दगी यूँ ही।
वक़्त ने की हो दिल्लगी यूँ ही।

इस क़दर है चलन दिखावे का,
छलती देखी है सादगी यूँ ही।

जो मिला छोड़ के यहीं जाना,
पल में होगी सुपुर्दगी यूँ ही।

ख़्वाहिशों की हैं लंबी फहरिश्तें,
अब कहाँ होती बंदगी यूँ ही।

आज़माइश 'किरण' तुम्हारी है,
हर सु बिखरी है तीरगी यूँ ही।

©विनीता किरण

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