Monday, 27 July 2020

ग़ज़ल # 73

मुसाफिर है सभी जग में, ज़रा दो पल ठहर जाओ।
मिली फुर्सत न बरसो से, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

कभी साज़िश थी किस्मत की, कभी सूरत न मिलने की,
मुहब्बत की गुजारिश ये, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

कली चटकी, उडी तितली, सजाए रंग कुदरत ने,
खिलाए फूल भवरों ने, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

तुम्हें पाने की ख़्वाहिश में, भटकते हैं ज़माने से,
मिला है साथ, कब छूटे, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

मिली मोहलत है थोड़ी सी, बने सूरत तो मिलने की, 
'किरण' ये साँस भी रूठे, ज़रा दो पल ठहर जाओ।

💖किरण

ग़ज़ल # 72

जो समझे तो इतना इशारा बहुत है।
तेरा नाम लिख कर मिटाया बहुत है।

मुहब्बत का उसकी सहारा बहुत है ।
सितमगर है लेकिन वो प्यारा बहुत है।

ये माना है इज़हार दस्तूर-ए-उल्फ़त,
मगर सुन कि दिल ने पुकारा बहुत है।

ज़ुबाँ पर थे ताले हया के मगर हाँ,
नज़र यूँ बचा के निहारा बहुत है।

हया से झुकी पलकें आहिस्ता उठना,
चुराने को दिल वो नज़ारा बहुत है।

बयां की न लफ़्ज़ों में, चाहत तो दिल की,
असर दिल पे वो छोड़ जाता बहुत है ।

मनाना तो आता नहीं हैं उसे पर,
अदाओं से अपनी हँसाता बहुत है।

है शामिल वो ख़्वाबों-ख़यालों में फिर भी,
बिना उसके इक पल भी तन्हा बहुत है।

लहक सी वो लाया 'किरण' ज़िन्दगी में,
मगर दूरियों ने सताया बहुत है।

💖 किरण

ग़ज़ल #71

शाम है कितनी हसीं, लौट के घर जाऊँ मैं ?
कौन सा घर है मेरा और किधर जाऊँ मैं?

दो घड़ी ही तो गुज़ारी है तेरे पहलू में,
और कहते हो कि बस यूँ ही गुज़र जाऊँ मैं?

हाँ मुहब्बत है तुम्हीं से, ये कहा था मैंने,
अब ज़माने से डरूँ और मुकर जाऊं मैं ?

कब के बिछड़े जो मिले हो तो नहीं जाना अब,
वक़्त भी बिगड़े तो पूछे कि सुधर जाऊं मैं?

रोशनी है तो अंधेरे भी सफ़र में होंगे,
छोड़ के हाथ 'किरण' राह में, डर जाऊं मैं?

💖 किरण