Tuesday, 24 May 2016

ग़ज़ल # 42

बाग़, झूले, पेड़, पर्वत और पाखी अब कहाँ।
तितलियों के रंग, फूलों की जवानी अब कहाँ।

दर दिवारें सज गयीं पर रंग रिश्तों के उड़े,
है इमारत ही सलामत, घर है बाकी अब कहाँ।

दर्द पीकर मुस्कुराए, बाँट ले खुशियाँ सभी,
यूँ निभाए दोस्ती जो, है वो साथी अब कहाँ ।

जाँ लुटा दीवानगी में रच गए इतिहास जो,
हीर राँझे से दिवाने, काफ़िरी भी अब कहाँ।

कल तलक शामिल नहीं था ज़िन्दगी में वो मेरी,
हाँ 'किरण' उसके बिना पर ज़िन्दगी भी अब कहाँ।
©विनीता सुराना 'किरण'

ग़ज़ल # 41

याद है गुज़रा ज़माना, जैसे कल की बात हो।
और वो हर इक फ़साना, जैसे कल की बात हो।

बारिशों के दिन सुहाने, वो मुलाक़ातें हसीं,
साथ बूँदों का तराना, जैसे कल की बात हो।

दौर थे वो महफ़िलों के, दोस्तों का साथ था,
दिल से दिल का दोस्ताना, जैसे कल की बात हो।

इक सितारा था नज़र में, जागते थे रात भर,
फ़िर उसी का टूट जाना, जैसे कल की बात हो।

हक़ तुम्हीं ने तो दिया था रूठने का ख़ुद किरण,
रूठ जाने पर मनाना, जैसे कल की बात हो।

©विनीता सुराना 'किरण'