Tuesday, 24 May 2016

ग़ज़ल # 41

याद है गुज़रा ज़माना, जैसे कल की बात हो।
और वो हर इक फ़साना, जैसे कल की बात हो।

बारिशों के दिन सुहाने, वो मुलाक़ातें हसीं,
साथ बूँदों का तराना, जैसे कल की बात हो।

दौर थे वो महफ़िलों के, दोस्तों का साथ था,
दिल से दिल का दोस्ताना, जैसे कल की बात हो।

इक सितारा था नज़र में, जागते थे रात भर,
फ़िर उसी का टूट जाना, जैसे कल की बात हो।

हक़ तुम्हीं ने तो दिया था रूठने का ख़ुद किरण,
रूठ जाने पर मनाना, जैसे कल की बात हो।

©विनीता सुराना 'किरण'

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