Wednesday, 26 May 2021

ग़ज़ल#67

बिखरते है संवरते है दिलों में फिर भी पलते हैं ।
ये ख़्वाबों के परिंदे है उड़ाने रोज़ भरते हैं।

संभाले है मरासिम ये बहुत अरमान से लेकिन
दुखाते हैं बहुत दिल को कभी जब वार करते हैं ।

कभी वादे किये तुमने भुला बैठे हो पल भर में
भरम ये जो वफ़ा का है न टूटे अब यूँ डरते हैं ।

धड़कने से अगर दिल के यकीं हो जाए जीने का 
सम्भालो दिल तुम्हें दे के चलो हम आज मरते हैं ।

ख़ुशी के चार पल काफ़ी गमों के जब अँधेरे हो
‘किरण’ इक आस की चमके हज़ारों दीप जलते हैं ।

©विनीता किरण