Saturday, 25 June 2016

ग़ज़ल # 45

दिल की है सदा भी वो।
मेरा हमनवा भी वो।

आशना है उससे दिल,
दिल का आसरा भी वो।

अब गिला भी क्या करूँ,
दर्द भी दवा भी वो।

याद और कुछ नहीं,
मेरी हर दुआ भी वो।

ज़िन्दगी है ख़ुशनुमा,
हमसफ़र, सखा भी वो।

कद्रदान है मेरा,
और आइना भी वो।

मैं 'किरण' वो आफ़ताब,
शब में है ज़िया भी वो।

©विनीता सुराना किरण

ग़ज़ल #44

मन में जब तक तिश्नगी है।
तब तलक ही ज़िन्दगी है।

बिन जताए दे दिया दिल,
इतनी हम में सादगी है।

इश्क़ है, उससे कहा तो,
कहता है, आवारगी है।

दर्द तो अरसे पुराना,
शे'र में पर ताज़गी है।

वो मिले या रब ही अब तो,
ख़ाक वरना बन्दगी है।

झूठ का हासिल सिफ़र ही,
हर क़दम शर्मिंदगी है।
              
अब किरण का मोल ही क्या,
भा गयी जब तीरगी है।

©विनीता सुराना 'किरण'