मन में जब तक तिश्नगी है।
तब तलक ही ज़िन्दगी है।
बिन जताए दे दिया दिल,
इतनी हम में सादगी है।
इश्क़ है, उससे कहा तो,
कहता है, आवारगी है।
दर्द तो अरसे पुराना,
शे'र में पर ताज़गी है।
वो मिले या रब ही अब तो,
ख़ाक वरना बन्दगी है।
झूठ का हासिल सिफ़र ही,
हर क़दम शर्मिंदगी है।
अब किरण का मोल ही क्या,
भा गयी जब तीरगी है।
©विनीता सुराना 'किरण'
No comments:
Post a Comment