आज बूँदों से मुलाक़ातें लिखीं।
कह न पाये जो तुम्हें, बातें लिखीं।
जब सबा छूकर तुम्हें, मुझसे मिली,
ख़ुश्क से ख़्वाबों की रंगत भी खिली,
अब्र बरसे पर सुकूँ दिल को कहाँ,
तिश्नगी सी आज बरसातें लिखीं।
जब भिगोया था फ़ुहारों ने हमें,
वक़्त तब रुक सा गया, पल वो थमें,
जो लुटाई थी फिज़ा ने बारहा,
वो सभी अनमोल सौगातें लिखीं।
बारिशों में जब बहाने से मिले,
भीगते तन-मन गुलाबों से खिले,
फिर उन्हीं लम्हात में भीगी 'किरण'
वो मुहब्बत की हसीं रातें लिखीं।
©विनीता सुराना 'किरण'
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