Thursday, 9 June 2016

ग़ज़ल # 43

ग़ज़ल कहना,नहीं है खेल बच्चों का बताते हैं।
बड़ा तपता है ये दिल तब कहीं अशआर आते हैं।

सुख़नवर है वही सच्चा, कहे जज़्बात गैरों के,
मग़र कितने सुख़नवर हैं जो ये ज़हमत उठाते हैं।

उड़ा अशआर औरों के, बड़े शायर हुए साहिब,
अदब की महफ़िलों में अब मुबारक़बाद पाते हैं।

सुनाते हैं वो बेहूदे लतीफ़े ख़ूब तबियत से,
पड़ें जब तालियाँ उन पर , ख़ुशी से फूल जाते हैं ।

क़लम पर हो भरोसा तो ख़ुशामद की ज़रूरत क्या,
हुनर अल्फ़ाज़ का लेकर 'किरण' वो जगमगाते हैं।
©विनीता सुराना 'किरण'

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