Tuesday, 12 April 2016

न मैं राधा (गीत)


न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा।
न मन की बात तुम समझे, न मैंने प्रीत को जाना।

न मीठी तान मुरली की, न सम्मोहन कन्हैया सा,
पुकारा भी अगर तुमने, कदम कैसे भला थमते ।
तपस्या की न मीरा सी, प्रतीक्षा की न राधा सी,
अगर विष पी लिया होता, कहाँ तुम कृष्ण बन सकते।
दबा हो बीज संशय का, खिले कैसे कली मन की,
न अपनाया कभी मन से, न अपना ही कभी माना।
न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा........

न कसमों में तुम्हें जकड़ा, न रस्मों की कसी गाँठें,
छुपा था नाम मेहन्दी में, मगर तुमने कहाँ देखा |
युगों तक साथ पाने को, कभी व्रत भी मैं रख लेती,
अगर मन पर खिची होती, तुम्हारी प्रीत की रेखा |
कटे तन्हा सभी दिन वो, कटी रातें भी तन्हा सी,
तलाशा एक साथी बस, न चाहा था ख़ुदा पाना |
न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा....
©विनीता सुराना 'किरण'

ग़ज़ल #37

उनकी बातों पे ऐतबार नहीं ।
पर कहें कैसे इंतज़ार नहीं ।

गर मरासिम को नाम दे न सकें,
दिल पे क्या उसका इख़्तियार नहीं।

बेसबब यूँ धड़क रहा दिल क्यूँ,
गर मुहब्बत में बेक़रार नहीं।

दिल में महफूज़ अक़्स है उनका,
दिल से बढ़कर तो राज़दार नहीं।

हाँ, 'किरण' कुछ कहा नहीं उनसे,
हो न इज़हार, क्या वो प्यार नहीं।
©विनीता सुराना 'किरण