न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा।
न मन की बात तुम समझे, न मैंने प्रीत को जाना।
न मीठी तान मुरली की, न सम्मोहन कन्हैया सा,
पुकारा भी अगर तुमने, कदम कैसे भला थमते ।
तपस्या की न मीरा सी, प्रतीक्षा की न राधा सी,
अगर विष पी लिया होता, कहाँ तुम कृष्ण बन सकते।
दबा हो बीज संशय का, खिले कैसे कली मन की,
न अपनाया कभी मन से, न अपना ही कभी माना।
न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा........
न कसमों में तुम्हें जकड़ा, न रस्मों की कसी गाँठें,
छुपा था नाम मेहन्दी में, मगर तुमने कहाँ देखा |
युगों तक साथ पाने को, कभी व्रत भी मैं रख लेती,
अगर मन पर खिची होती, तुम्हारी प्रीत की रेखा |
कटे तन्हा सभी दिन वो, कटी रातें भी तन्हा सी,
तलाशा एक साथी बस, न चाहा था ख़ुदा पाना |
न मैं राधा, न मैं मीरा, मगर तुम भी कहाँ कान्हा....
©विनीता सुराना 'किरण'
No comments:
Post a Comment