Monday, 18 April 2016

Ghazal#38

जो ठान लें मन में अगर, पग रोकते बिल्कुल नहीं।
हो साथ कोई या अकेले, सोचते बिल्कुल नहीं।

जो सादगी में ढल गये, आभूषणों का क्या करें,
दौलत बिछी हो राह में, वो देखते बिल्कुल नहीं।

श्रम पर भरोसा हो जिन्हें, वो कब डिगे है कर्म से,
हो मुश्किलें कितनी मगर, वो बैठते बिल्कुल नहीं।

हाँ झूठ मीठा भी लगे, पर सत्य सा अमृत कहाँ,
जो स्वाद सच का चख लिया, वो छोड़ते बिल्कुल नहीं।

हर रात होगी चाँदनी, संभव नहीं है ये 'किरण',
डर कर अँधेरे से दिये, पर हारते बिल्कुल नहीं।
©विनीता सुराना 'किरण'

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