Tuesday, 8 November 2016

ग़ज़ल # 54

ग़म हँसी में अब उड़ाना सीख लो।
अश्क़ आँखों में छुपाना सीख लो।

तोडना आसां है दिल का आशियाँ,
घर किसी दिल में बसाना सीख लो।

काँच से नाज़ुक मरासिम हो गए,
बदनज़र से तुम बचाना सीख लो।

दोस्त सच्चा रब से कुछ कम तो नहीं,
रूठ जाए तो मनाना सीख लो।

वक़्त गुज़रा तो कभी लौटा नहीं,
आज से कल को सजाना सीख लो।

ख़्वाब आँखों से रिहा होंगे सभी,
बस ज़रा ख़ुद को जगाना सीख लो।

सुबह् लेकर आएगी पहली किरण,
तीरगी का डर भगाना सीख लो।
©विनीता सुराणा किरण

ग़ज़ल # 53

कभी रब से कोई परदा नहीं था
दुआ में दिल ने कुछ माँगा नहीं था।

मुक़म्मल इक ग़ज़ल अपनी भी होती,
मगर दिल टूट के बिखरा नहीं था।

तसव्वुर में रहा वो उम्र भर यूँ,
यकीं है मुझको वो साया नहीं था।

महज़ इक हादसा ही तो हुआ है,
जो डूबा वो मेरा अपना नहीं था।

उसे पाने की ख़्वाहिश में लुटे हम,
'किरण' ये दिल यूँ ही हारा नहीं था।

©विनीता सुराणा किरण