Tuesday, 8 November 2016

ग़ज़ल # 53

कभी रब से कोई परदा नहीं था
दुआ में दिल ने कुछ माँगा नहीं था।

मुक़म्मल इक ग़ज़ल अपनी भी होती,
मगर दिल टूट के बिखरा नहीं था।

तसव्वुर में रहा वो उम्र भर यूँ,
यकीं है मुझको वो साया नहीं था।

महज़ इक हादसा ही तो हुआ है,
जो डूबा वो मेरा अपना नहीं था।

उसे पाने की ख़्वाहिश में लुटे हम,
'किरण' ये दिल यूँ ही हारा नहीं था।

©विनीता सुराणा किरण

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