Tuesday, 12 April 2016

ग़ज़ल #37

उनकी बातों पे ऐतबार नहीं ।
पर कहें कैसे इंतज़ार नहीं ।

गर मरासिम को नाम दे न सकें,
दिल पे क्या उसका इख़्तियार नहीं।

बेसबब यूँ धड़क रहा दिल क्यूँ,
गर मुहब्बत में बेक़रार नहीं।

दिल में महफूज़ अक़्स है उनका,
दिल से बढ़कर तो राज़दार नहीं।

हाँ, 'किरण' कुछ कहा नहीं उनसे,
हो न इज़हार, क्या वो प्यार नहीं।
©विनीता सुराना 'किरण

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