Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 64

करें शिकवा शिकायत क्या किसे अपना कहें साथी।
शज़र ही तोड़ दे शाखें, गिला किससे करें साथी।

कभी हम बज़्म-ए-रौनक थे, निगाहों में हमीं थे तब,
वो जा बैठे हैं गैरों में, कहो कैसे सहें साथी।

ये माना उनसे उल्फ़त है, मगर गैरत भी है हम में,
बड़ा महंगा है सौदा ये, कहाँ तक हम गिरें साथी।

तुम्हें ख़त लिखने बैठे तो सियाही नम थी अश्क़ों से,
स्याही से मिलावट की, खतों में क्या लिखें साथी।

'किरण' मिलना बिछड़ना खेल होता है नसीबों का,
करम गर हो ख़ुदा का तो बदल तक़दीर दें साथी।

©विनीता सुराणा 'किरण'

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