संदल सा महके मन मेरा
किसकी यादों का है डेरा ।
रात नहीं अब तन्हा लगती
ख्वाब किया करते हैं फेरा।
जो कुछ है 'उसकी' रहमत है
क्यूँ करता है मेरा तेरा ।
पंछी इक दिन उड़ जाना है
दुनिया ठहरी रैन बसेरा ।
रात 'किरण' लंबी हो कितनी
दूर नहीं है मगर सवेरा ।
©विनीता किरण
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