Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 65

संदल सा महके मन मेरा
किसकी यादों का है डेरा ।

रात नहीं अब तन्हा लगती
ख्वाब किया करते हैं फेरा।

जो कुछ है 'उसकी' रहमत है
क्यूँ करता है मेरा तेरा ।

पंछी इक दिन उड़ जाना है
दुनिया ठहरी रैन बसेरा ।

रात 'किरण' लंबी हो कितनी
दूर नहीं है मगर सवेरा ।

©विनीता किरण

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