Saturday, 24 March 2018

ग़ज़ल # 62

दिल में कुछ उनके, दिखाया और है।
दोस्त या दुश्मन, छलावा और है।

पास आने की कवायद सच है या,
दूर जाने का बहाना और है।

अपने ही घर का पता चलता नहीं,
राह अनजानी, नज़ारा और है।

इक लहर बिछड़ी है साहिल से मगर,
गम न कर आगे किनारा और है।

साथ जन्मों का सुना हमने बहुत,
हाँ मगर अब तो ज़माना और है।

चुभ रहें हो लफ्ज़ मेरे आज, पर
मेरी बातों का इशारा और है।

किस गुमाँ में जी रहे हो तुम 'किरण'
तुम नहीं तो क्या, सहारा और है।

©विनीता सुराणा किरण

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