Tuesday, 25 July 2017

ग़ज़ल # 61

सच का साथ निभा कर देखो।
खुद समझो, समझा कर देखो।

नफरत की खेती क्या करनी,
मन में प्रेम उगा कर देखो।

शुक्राना कहने आएंगे,
पंछी चंद उड़ा कर देखो।

कितने जंगल उजड़े तुमसे।
कुछ तो पेड़ लगाकर देखो।

लौट के झोली में आएंगी,
खुशियाँ आज लुटाकर देखो।

कसरत खूब दिमागी कर ली,
दिल पर दांव लगा कर देखो।

मुमकिन है कुछ देर वो ठहरे,
बातों में उलझा कर देखो।

दिल है, संग नहीं सीने में,
थोड़ा प्यार जता कर देखो।

रात चलेगी चालें अपनी,
सुब्ह किरण को लाकर देखो।

©विनीता सुराना किरण

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