Tuesday, 25 July 2017

ग़ज़ल # 60

मुमकिन है वो मिले भी, मगर हमसफर न हो।
दिल क्या करे जो उसके बिना भी बसर न हो।

वो लाख हमसे यूँ तो छुपाए है हाल-ए-दिल,
ऐसा नहीं मगर कि हमारी ख़बर न हो।

लब पर न आया नाम, दुआ में मगर रहा,
खारिज हो हर दुआ जो तू शामिल अगर न हो।

जलवा है उसके साथ का, हर शै में नूर है,
बेनूर वो खुशी जो मुहब्बत से तर न हो।

गर सुब्ह तेरे साथ हो तारीकी भी कबूल,
तुझ बिन किरण की राह में कोई सहर न हो।

©विनीता सुराना किरण

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