मुमकिन है वो मिले भी, मगर हमसफर न हो।
दिल क्या करे जो उसके बिना भी बसर न हो।
वो लाख हमसे यूँ तो छुपाए है हाल-ए-दिल,
ऐसा नहीं मगर कि हमारी ख़बर न हो।
लब पर न आया नाम, दुआ में मगर रहा,
खारिज हो हर दुआ जो तू शामिल अगर न हो।
जलवा है उसके साथ का, हर शै में नूर है,
बेनूर वो खुशी जो मुहब्बत से तर न हो।
गर सुब्ह तेरे साथ हो तारीकी भी कबूल,
तुझ बिन किरण की राह में कोई सहर न हो।
©विनीता सुराना किरण
No comments:
Post a Comment