Monday, 19 June 2017

ग़ज़ल # 59

सारी रिवायतें यूँ निभाते चले गए।
ख़ुद के वुज़ूद को ही भुलाते चले गए।

आंखों में जज़्ब कितने समंदर रहे मगर,
औरों के अश्क़ फिर भी उठाते चले गए।

ये पूछते हैं आप कि हमने दिया है क्या,
कुछ ख़्वाब ही थे पास, लुटाते चले गए।

इस दिल को ऐसी आप से निस्बत सी हो गयी,
शिक़वे थे आपसे वो, छुपाते चले गए।

निकली है बात आज तो कहने भी दो 'किरण'
हमको दिया है क्या जो, जताते चले गए

©विनीता सुराना किरण

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