Friday, 1 June 2018

ग़ज़ल # 69


किसी सहर का उसे इंतज़ार है अब भी
बहार आएगी फिर ऐतबार है अब भी।

फ़ना हुआ जो मुहब्बत के नाम पर हँस के,
कहीं महकती सी उसकी मज़ार है अब भी।

जिसे नसीब नहीं रौशनी का इक कतरा
दिए मगर वो बनाता हज़ार है अब भी।

हुनर से जिसके खड़ी हैं इमारतें पुरज़र (धन संपन्न)
तलाश छत की करे कामगार है अब भी।

मिला नहीं था 'किरण' दो क़दम का साथ जिसे,
वफ़ा के नाम पे वो कर्ज़दार है अब भी।

©विनीता सुराना 'किरण'

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