ख़ुद को ढूंढा तुम्हारी आँखों में।
क्या न खोया तुम्हारी आँखों में।
ख़्वाब सारे ही लौट आये हैं,
किसका पहरा तुम्हारी आँखों में।
चश्मे तर, सांसों में नमी सी है,
कुछ तो पिघला तुम्हारी आँखों में।
गर किताबों सा पढ़ लिया है तो,
राज़ रखना तुम्हारी आँखों में।
इक 'किरण' के सिवा सभी देखे,
लगता मेला तुम्हारी आँखों में।
©विनीता किरण
No comments:
Post a Comment