Saturday, 12 July 2014

ग़ज़ल # 2

गमेदिल का फ़साना क्या सुनाएं
दिल-ए-नादां को रुसवा क्यूँ कराएं

नज़र गुस्ताख ने छुप-छुप के देखा
मगर उनसे नज़र कैसे मिलाएं

हमें वाबस्तगी* उनसे है माना   *(प्रेम, सम्बन्ध, अपनापन)
जुबां से हम उन्हें कैसे बुलाएं

कभी ज़ुल्मत* में रोए भी बहुत हम *(अन्धकार)
नुमाइश अश्कों की पर क्यूँ लगाएं

बिछड़ कर तो फ़ना होना था हमको
फ़राइज़* पर किरणकैसे भुलाएं (फ़र्ज़)
©विनिता सुराना 'किरण'










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