चल रहा जिंदगी का सफ़र आज भी
फ़ासले दरमियाँ हैं मगर आज भी
ग़र मुनासिब नहीं साथ हम चल सकें
क्यूँ तलाशे वही हम डगर आज भी
वक़्त के फ़ैसले कौन पाया बदल
राह तेरी तके हैं नज़र आज भी
अलहदा राह अपनी न माने जहां
पूछता है तुम्हारी खबर आज भी
ख़त रखे है छुपा कर तुम्हारे ‘किरण’
खुशबुओं का हवा में असर आज भी
©विनिता सुराना 'किरण'

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