चली है फिर हवाएं ये कहाँ मन को
उड़ाती हैं
बरसती है ये बूंदें या तराने
गुनगुनाती हैं
है वाकिफ दर्द से मेरे सभी ये
पत्तियाँ भी अब
भिगोया बारिशों ने है, कि अश्कों में नहाती हैं
विसाले यार की तो आरज़ू होती बहुत
लेकिन
क़मर जब भी दिखाई दे, फिज़ाएं क्यूँ
लजाती हैं
कभी हो फ़ासले भी गर मुहब्बत कम नहीं
होती
नहीं हो राबता फिर भी वो यादें दिल जलाती हैं
सुना है अब ज़माने में वफ़ा मिलती
किताबों में
‘किरण’ जब ज़िक्र हो उनका, वफ़ाएं याद आती हैं
©विनिता सुराना 'किरण'

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