मिले
हैं खार तो कुछ गुल खिलाएँ
मिटा
कर फ़ासले सारे दिलों से
चलो
इक आशियाँ फिर से सजाएँ
करें
कोई जतन ऐसा कभी तो
किसी
रोते हुए को हम हँसाएँ
न
देता साथ साया भी जहाँ तक
अँधेरों
को चिरागों से हराएँ
चिताएं
जल रहीं है नफरतों की
चलो
नगमे मुहब्बत के सुनाएँ
ख़ुशी
भी दी तुम्हीं ने अश्क भी अब
कहो
कैसे ‘किरण’ तुमको भुलाएँ
विनिता सुराना किरण

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