मन बंजारा दर-दर भटके, ढूंढ रहा है किसका पता |
सारा जग ही अपना है जब, कौन पराया अब है बता |
धूप सुनहरी मुट्ठी में है, मन अँधियारा क्यूँ ये भला,
प्रेम-नदी है कल-कल बहती, द्वेष बता फिर क्यूँ है पला |
तृष्णा ऐसी गुफा घनेरी, जिसका ओर न कोई छोर,
माया-मद है रात अमावस, कभी नहीं हो जिसकी भोर |
पीर परायी समझ ज़रा तू, अपनापन अब कुछ तो जता,
मन बंजारा .....
हार-जीत किस्मत का लेखा, श्रम से खींच न पीछे हाथ,
कोई साथ चले न चले पर, कर्म सदा हैं तेरे साथ |
हर मौसम के रंग अनोखे, सबकी अपनी है पहचान,
क्षण-प्रतिक्षण जो बदले जीवन, कौन सका है उसको जान |
कल की चाहत, आज भुला दे, कभी न करना ऐसी खता,
मन बंजारा .....
©विनिता सुराना किरण

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