Friday, 20 February 2015

ग़ज़ल # 9

सूखे फ़ूल मुहब्बत के, दिल सहरा है ।
चश्मे पुरनम छोड़ो, दरिया गहरा है।

बेपरवा(ह) दिखते रंज़ो-गम से यूँ तो,
क़तरा शबनम बंद पलक पे ठहरा है।

रोके चाहे टोके कब किसकी सुनता,
उल्फ़त में खोया जबसे, दिल बहरा है।

और दुआओं में क्या माँगेंगे रब से,
नाम जुबाँ पे उसका, दिल पे पहरा है।

रोज़ बनायें तस्वीरें सब इक जैसी,
हर इक शै में दिखता उसका चेहरा है।

©विनीता सुराना 'किरण'

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