Thursday, 31 July 2014

कहानी (गीतिका)

चलो फिर लिखे हम नयी इक कहानी |
कि चलना न रुकना कहे जिंदगानी ||

मिले और बिछड़े सफ़र है ये जीवन |
नहीं टूटने पाए देखो रवानी ||

निगाहें गगन पर कदम हो ज़मीं पर |
चले सांस जब तक नहीं हार मानी ||

कभी धूप होगी कभी चाँदनी भी |
लबों पर हँसी और आँखों में पानी ||

पुकारे ‘किरण’ लौट आना यहीं तुम |
बुलाती है तुमको डगर ये सुहानी ||
©विनिता सुराना ‘किरण’

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