चलो फिर लिखे हम नयी
इक कहानी |
कि चलना न रुकना कहे
जिंदगानी ||
मिले और बिछड़े सफ़र
है ये जीवन |
नहीं टूटने पाए देखो
रवानी ||
निगाहें गगन पर कदम
हो ज़मीं पर |
चले सांस जब तक नहीं
हार मानी ||
कभी धूप होगी कभी
चाँदनी भी |
लबों पर हँसी और
आँखों में पानी ||
पुकारे ‘किरण’ लौट
आना यहीं तुम |
बुलाती है तुमको डगर
ये सुहानी ||
©विनिता सुराना ‘किरण’

Wahhh....Bhut umda..
ReplyDeleteShukriya ram ashish ji
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