Thursday, 19 March 2015

ग़ज़ल # 10


ज़िन्दगी तुझसे राबिता क्यूँ है | 
साथ तेरा लगे सज़ा क्यूँ है।
ज़ीस्त करती नहीं वफ़ा ही जब,
फिर क़ज़ा से खफ़ा खफ़ा क्यूँ है।
झूठ दिल को सुकूँ नहीं देता,
सच से फिर भी ये फ़ासला क्यूँ है।
ज़ख्म अक्सर दिये हबीबों ने,
फिर रक़ीबों से ही गिला क्यूँ है।
वार छुप कर किया करें अपने,
गैर पर फिर शक़ो शुब्हा क्यूँ है।
वास्ता उनको गर नहीं हमसे,
ख़्वाब में उनका दाख़िला क्यूँ है।
सादगी का अगर चलन है तो,
हर किसी घर में आइना क्यूँ है।
गर सुकूं है कहीं न घर जैसा,
फिर भी इंसां भटक रहा क्यूँ है।
वक़्त हर दर्द की दवा है गर,
मयकदे में तलाशता क्यूँ है।
जब किरण ही पता सहर का दे,
नूर अफ़्शाँ को ताकता क्यूँ है।
©विनीता सुराणा 'किरण'
राबिता- लगाव, सम्बन्ध
क़ज़ा - मृत्यु
हबीबों -दोस्तों
रक़ीबों - दुश्मनों

नूर अफ़्शाँ - रौशनी देने वाला

No comments:

Post a Comment