Monday, 30 March 2015

ग़ज़ल # 11

है बात अधूरी सी पर याद तो आएगी।
हर शै में मुहब्बत है, आवाज़ लगाएगी।

वादे का भरोसा क्या, इन्सां ही बदल जाए,
ये रस्म अधूरी सी, फिर बाँध न पाएगी।

ख़्वाहिश जो अधूरी है, होनी है मुकम्मल वो,
अपनों की दुआ सच्ची जब रंग दिखाएगी।

हर आस अधूरी हो, दो कौर को भी तरसे,
ख़्वाबों में भी उसको तो रोटी ही सताएगी।

समझो न उसे कमतर, कमज़ोर भले हो वो,
इक आह दुखी दिल की, महलों को गिराएगी।

हर साज़ है पहरे में तुम गीत सुनाते हो,
जो सुर ही अधूरें हो, महफ़िल न लुभाएगी।

आधी सी मुहब्बत ये मंजूर 'किरण' क्यूँ हो,
आज़िल वो नहीं है जो ख़ैरात उठाएगी।
©विनीता सुराना 'किरण'


*आज़िल- जल्दबाज़

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