Friday, 3 April 2015

ग़ज़ल # 12


आज़ाद परिंदों का कब एक ठिकाना है।
मंज़िल की नहीं परवा(ह), बस उड़ते ही जाना है।

दामन में मुहब्बत के, कुछ पल तो सुकूं देंगे,
थोड़े से वही पल तो, जीने का बहाना है।

मुमकिन ये नहीं नीयत, काटों की कभी बदले,
काँटें है जहाँ पर भी, फ़ूलों को खिलाना है।

बेनाम मज़ारों में जो दफ़्न हुए किस्से,
उस मौन शहादत को आवाज़ बनाना है।

दौलत के नशे में सब, मेला हैे ये रिन्दों का
इस अंधे नशे से अब, घर अपना बचाना है।

सूरज न मिले, रूठे हो चाँद सितारें भी,
आशा की किरण से तब, घर अपना सजाना है।
©विनीता सुराना 'किरण'

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