मैं सुर सरिता एक भ्रमित सी, और सुरमयी तुम सरगम।
श्वेत श्याम सा जीवन मेरा, तुम हो सतरंगी मौसम।
श्वेत श्याम सा जीवन मेरा, तुम हो सतरंगी मौसम।
समय चक्र में गोते खाते, बदले कितने ही चोले।
राधा कभी, कभी थी सीता, पन्ने नित नूतन खोले।
पूर्ण कभी पर हुई कहाँ मैं, सदा अधूरी ही गाथा,
संग तुम्हारा पा कर भी मैं, चली अकेली ही हरदम।
श्वेत श्याम सा ...
राधा कभी, कभी थी सीता, पन्ने नित नूतन खोले।
पूर्ण कभी पर हुई कहाँ मैं, सदा अधूरी ही गाथा,
संग तुम्हारा पा कर भी मैं, चली अकेली ही हरदम।
श्वेत श्याम सा ...
हर युग में इक नयी परीक्षा, अलग-अलग थे निर्णायक।
कसा कसौटी पर मुझको ही, तुम तो बने रहे नायक।
कैसा जाल बुना ये तुमने, मैं उलझी सी हूँ अब तक,
फिर-फिर प्रीत तुम्ही से जोड़ी, तुमको चाहा जनम-जनम।
श्वेत श्याम सा ....
कसा कसौटी पर मुझको ही, तुम तो बने रहे नायक।
कैसा जाल बुना ये तुमने, मैं उलझी सी हूँ अब तक,
फिर-फिर प्रीत तुम्ही से जोड़ी, तुमको चाहा जनम-जनम।
श्वेत श्याम सा ....
आज नहीं तो कल का सूरज, प्रश्न करेगा ये मुझसे।
कैसी प्रीत, तड़प ये कैसी, कैसी लगन लगी तुमसे।
स्वप्न अधूरे बिखरे अरमाँ, फिर भी ये कैसा बंधन,
क्यों रंगों से दूरी मेरी, जब तुम रंगों का संगम।
श्वेत श्याम सा....
©विनीता सुराना 'किरण'
कैसी प्रीत, तड़प ये कैसी, कैसी लगन लगी तुमसे।
स्वप्न अधूरे बिखरे अरमाँ, फिर भी ये कैसा बंधन,
क्यों रंगों से दूरी मेरी, जब तुम रंगों का संगम।
श्वेत श्याम सा....
©विनीता सुराना 'किरण'
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