ख़ुदा बन के सारा जहां ले गया।
ख़फ़ा यूँ हुआ हर निशाँ ले गया।
रहा दिल में महमां जो बन के कभी,
चुरा के वही आसमां ले गया।
मुसाफ़िर कभी थे उसी राह के,
मुक़द्दर हमें ये कहाँ ले गया।
महकती कभी वो कली फ़ूल बन,
उसे तोड़ खुद बागबां ले गया।
वो झोंका हवा सा मिला दो घड़ी,
उड़ा कर 'किरण' शोख़ियाँ ले गया।
©विनीता सुराना 'किरण'
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