Saturday, 30 May 2015

ग़ज़ल # 14

रंजिश ये कैसी आज निभाई है आप ने ।
क्यूँ राह अब सही न दिखाई है आप ने।

मिलने की आरज़ू में धड़कते थे दिल जवां,
क्यूँ फिर सज़ा-ए-मौत सुनाई है आप ने।

जो रहनुमा बने हैं करें साजिशें वही,
कैसी ये रीत आज चलाई है आप ने।

मासूम इक कली को कुचल के गया,उसी
ज़ुल्मी के साथ कर दी सगाई है आप ने।

कहते 'समाज' ख़ुद को, दिखानी थी रौशनी,
बस इक 'किरण' थी वो भी, बुझाई है आप ने।
©विनीता सुराना 'किरण'

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