वफ़ा फ़ितरत नहीं इसकी तो फिर ये राब्ता क्यूँ है।
बता फिर भी वफ़ा इस ज़िन्दगी से चाहता क्यूँ है।
सजाना हो, जो ख़्वाबों को तो हसरत ही नहीं काफ़ी,
हक़ीक़त से मगर नादाँ बता यूँ भागता क्यूँ है ।
कभी भी कोशिशें सारी मुक़म्मल हो नहीं सकती,
मगर यूँ हार के रातों में तन्हा जागता क्यूँ है।
सुनी थी लोरियाँ मीठी कभी जिस माँ के आँचल में,
उसी माँ के बुलाने पर उसे दुत्कारता क्यूँ है।
अँधेरा जीत पर अपनी 'किरण' यूँ मुस्कुराया था,
जला जो दीप छोटा सा हुआ अब लापता क्यूँ है।
©विनीता सुराना 'किरण'
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