Thursday, 4 June 2015

ग़ज़ल # 16

ज़ख़्म भर भी जाएँ लेकिन हर निशां छुपता नहीं।
मख़मली पैबंद से भी रख़्न* ढक पाया नहीं।

कोशिशें पुरज़ोर हो पर कब दबी हैं चाहतें,
ख़ौफ़ेजाँ** से उल्फ़तों में डूबा दिल रुकता नहीं।

ख़त गुलाबी आज भी महका रहें तन्हाइयाँ,
हर्फ़*** धुंधलाएं मगर ये सिलसिला टूटा नहीं।

क्या सताएंगी हमें दुश्वारियाँ अब दोस्तों,
दर्द इतना पी चुके हैं, अब असर होता नहीं।

बदनुमाई**** छुप भी जाए तीरगी में रात भर,
पर सहर की इक 'किरण' से राज़ छुप सकता नहीं।
-विनीता सुराना 'किरण'

* छेद, दोष
** जान का खौफ़
*** अक्षर
**** कुरूपता

painting courtesy - Chanchala Inchulkar Soni

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