Thursday, 11 June 2015

ग़ज़ल # 17

नज़र में किसी की शरारत लिखी है।
संभलना ज़रा ये हिदायत लिखी है।

कहाँ  अब जगह नफरतों के लिए जब,
मुहब्बत की दिल पर इबारत लिखी है।

कहाँ जाने अब बिजलियाँ ये गिरेंगी,
कि जलवों में उनके क़यामत लिखी है।

अभी खौफ़ तारी जुबां पर है लेकिन,
दिलों में तो उनके बग़ावत लिखी है।

निवाले को तरसा है मासूम बच्चा,
तरसती निगाहों में हसरत लिखी है।

कोई हाथ ख़ाली न लौटा है दर से,
मेरी माँ के हाथों में बरकत लिखी है।

बिगाड़ेंगी क्या साज़िशें ज़ालिमों की,
लकीरों में रब की इनायत लिखी है।

पढ़े होंगे चेहरें हज़ारों 'किरण' यूँ,
मगर क्या किसी पर शराफ़त लिखी है।
©विनीता सुराना 'किरण'

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