Thursday, 11 June 2015

ग़ज़ल #18

कितने वादे सच्चे झूठे, हाँ लिख डाले हैं चिट्ठी में।
दिल अपना बहलाने ख़ातिर, ख़्वाब सजाये हैं चिट्ठी में।

तुमसे बिछड़े अरसा बीता, बात मगर कल सी लगती है,
साथ गुज़ारे पल जो हमने, आज उतारे हैं चिट्ठी में।

सोचा तुमको फ़ोन लगाएँ, पर क्या कह पाएंगें तुमको,
मन की बातें, शिक़वे सारे, दर्द सुनाये हैं चिट्ठी में।

करवट, सिलवट, गीत, ग़ज़ल सब, सूनी रातों का हिस्सा हैं,
ढूँढ सको तो पढ़ लेना तुम, राज़ छुपाये हैं चिट्ठी में।

लिख तो डाली चिट्ठी हमने, शब्द सभी पढ़ पाओगे तुम,
पर कुछ है जो शब्दों में हम, बाँध न पाये हैं चिट्ठी में।
©विनीता सुराना 'किरण'

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