Tuesday, 30 June 2015

ग़ज़ल # 19

फिर से आई है याद बरसातें।
काश फिर हों वही मुलाक़ातें।

हो अधूरी सी हसरतें पूरी,
अबकी बूँदें वो लाएं सौगातें।

जी उठेगा ये ख़ाली घर मेरा,
जब भी महकेंगी वो तेरी बातें।

गुदगुदाती हैं दिल मेरा अब भी,
याद आती हैं वो खुराफ़ातें।

कुछ क़दम साथ थे सफ़र में तुम,

जैसे क़िस्मत ने दी हों खैरातें।

सुब्ह की ख़ास हर 'किरण' यूँ तो,
पर न आऐंगी वो जवां रातें।
©विनीता सुराना 'किरण'

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