Thursday, 2 July 2015

गीतिका


सब दिया रब ने भला अब और हसरत क्या करूँ।
जब मुहब्बत से भरा दिल फिर अदावत क्या करूँ।

साथ उनका जो मिला तो हँस पड़ी तन्हाइयाँ,
जब समायी हर ख़ुशी घर में तो' जन्नत क्या करूँ।

दूर तक रोशन सहर सी है दमकती ज़िन्दगी,
धूप का टुकड़ा ही काफ़ी और मन्नत क्या करूँ।

सेज़ फूलों की नहीं माना सदा ये ज़िन्दगी,
ख़ार भी दो चार है तो अब शिक़ायत क्या करूँ ।

रात भी प्यारी सखी सी राहतें लाती रही,
इक 'किरण' ख़ातिर ही' रजनी की ख़िलाफ़त क्या करूँ।
-विनीता सुराना 'किरण'

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