घर की' ड्योढ़ी आज छूटी एक रोटी के लिए।
माँ पिता की आँख गीली एक रोटी के लिए।
श्वान खाए चाव से नित दूध रोटी बोटियाँ,
पिट गया मासूम गोपी एक रोटी के लिए।
रोटियों के ढेर देखे कल जहाँ थी शादियाँ,
बिक गयी कल रात कमली एक रोटी के लिए।
साहूकारों की दरों पर पगड़ियाँ कितनी झुकी,
ज़िन्दगी रख दी है गिरवी एक रोटी के लिए।
तन तपाया धूप में नित, भूख़ आधी मार ली,
साथ लाया प्याज़ चटनी एक रोटी के लिए।
देश ख़ातिर जाँ लुटा दी भूल कर परिवार को,
बेसहारा माँ है तरसी एक रोटी के लिए।
मुफ़लिसी की आग में यूँ जल गया बचपन 'किरण'
नन्हे हाथों में कटोरी एक रोटी के लिए।
©विनीता सुराना 'किरण'
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